आज हम सब जागरूक हैं, लेकिन हमारा पर्यावरण अब वैसा नहीं रहा जैसा पहले था। हम स्वयं अपने जीवन में वायु तथा जल की गुणवत्ता में हो रही गिरावट के दुष्प्रभाव का अनुभव करते हैं। जैसे- श्वसन रोग, विद्युत संयंत्र, स्वचालित वाहन निर्वातक, जलावन लकड़ी, विहित मल, विषैले रसायन, गाद तथा अन्य हानिकारक पदार्थ वायु तथा जल को प्रदूषित करते हैं। इस नोट्स लेख में हम अपने आसपास होने वाले हानिकारक परिवर्तन तथा परीक्षा में आने योग्य महत्वपूर्ण विषयों के बारे में चर्चा करेंगे।
प्रदूषण
पर्यावरण के विभिन्न घटकों में होने वाले अवांछित परिवर्तनों को प्रदूषण कहते हैं। सामान्य भाषा में प्रदूषण का अर्थ “दूषित वातावरण” है।
(1) वायु प्रदूषण
(2) जल प्रदूषण
वायु
वायु गैसों का मिश्रण है। इसमें लगभग 78% नाइट्रोजन तथा लगभग 21% ऑक्सीजन है। मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड, आर्गन, मेथैन तथा जलवाष्प भी उपस्थित होती है।
वायु प्रदूषण
वायु में अवांछित पदार्थ जैसे उद्योगों व स्वचालित वाहन से निकले धुएँ के मिल जाने से वायु को प्रकृति एवं संगठन में बदलाव आ जाता है।
• वायु ऐसे अनचाहे पदार्थ से संदूषित हो जाती हैं जो सजीव तथा निर्जीव दोनों के लिए हानिकारक है, इसे वायु प्रदूषण कहते हैं।
• इससे वायु के सामान्य संगठन में गुणात्मक या मात्रात्मक परिवर्तन हो जाते हैं।
वायु कैसे प्रदूषित होती हैं?
• जो पदार्थ वायु को संदूषित करते हैं, उन्हें वायु प्रदूषक कहते हैं।
• प्राकृतिक वायु प्रदूषक ज्वालामुखी का फटना, वनों में लगने वाली आग से उठा धुआँ अथवा धूल के कण हैं।
• फैक्ट्री, विद्युत संयंत्र, स्वचालित वाहन निर्यातक, लकड़ी, तथा उपलों के जलने से निकला धुआँ आदि वायु प्रदूषण के मुख्य कारक हैं।
• वाहन अधिक मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन, ऑक्साइड तथा धुआँ उत्पन्न करते हैं।
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वायु प्रदूषण से दुष्प्रभाव
• पेट्रोल तथा डीजल जैसे ईंधनों अपूर्ण दहन से कार्बन मोनोऑक्साइड उत्पन्न होती है। यह विषैली गैस है, जो रुधिर में ऑक्सीजन वाहक क्षमता को घटा देती हैं।
• धुएँ में नाइट्रोजन के ऑक्साइड उपस्थित होते हैं जो अन्य वायु प्रदूषकों तथा कोहरे के संयोग से धूम कोहरा बनाते हैं। इस कोहरे के कारण साँस लेने में कठिनाई, दमा, खांसी तथा बच्चों में साँस के साथ हरहराहट आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
• सीसायुक्त पेट्रोल में पाया जाने वाला टेट्रा एथिल लेड भी एक घातक प्रदूषक हैं। यह कैंसर एवं क्षय रोग का कारक है।
• विद्युत संयंत्रों में कोयले के दहन से सल्फर डाइऑक्साइड गैस उत्पन्न होती है, यह फेफड़ों को स्थाई रूप से क्षतिग्रस्त कर सकती है। यह सल्फर डाइऑक्साइड गैस पौधों को भी मृत कर देती है।
• क्लोरोफ्लोरो कार्बन (CFC) का उपयोग रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर तथा ऐरोसाॅल फुहार में होता है। इसके के द्वारा वायुमंडल की ओजोन परत क्षतिग्रस्त हो जाती हैं।
• डीजल तथा पेट्रोल के दहन से चलने वाले स्वचालित वाहनों के द्वारा अत्यंत छोटे कण उत्पन्न होते हैं, जो लंबे समय तक वायु में निलंबित रहते हैं। ये दृश्यता को घटा देते हैं।
• वायु प्रदूषण द्वारा केवल संजीव ही प्रभावित नहीं होते बल्कि भवन, स्मारक तथा प्रतिमाओं जैसी निर्जीव वस्तुएं भी प्रभावित होती हैं।
• ताजमहल का सफेद संगमरमर पत्थर वायु प्रदूषण के कारण बदरंग हो रहा है।
• स्थित ताजमहल आगरा के चारों ओर स्थित रबर परिक्रमण उद्योग, स्वचालित वाहन, रसायन और विशेषकर मथुरा तेल परिष्करणी जैसे उद्योगों से सल्फर डाइऑक्साइड तथा नाइट्रोजन डाइऑक्साइड गैस उत्पन्न होती है।
• यह गैसे वायुमंडल में उपस्थित जलवाष्प से अभिक्रिया करके सल्फ्यूरिक अम्ल तथा नाइट्रिक अम्ल बनाती हैं।
• यह वर्षा को अम्लीय बनाकर वर्षा के साथ पृथ्वी पर बरस जाते हैं, जिसे अम्ल वर्षा कहते हैं।
• एक ओर मानवीय क्रियाकलापों के कारण CO2 निरंतर वातावरण में मोचित हो रही हैं तथा दूसरी और वनोन्मूलन के कारण CO2 की खपत करने वाले वृक्षों की संख्या कम हो रही है।
• CO2 ऊष्मा को रोक लेती हैं और उसे अंतरिक्ष में नहीं आने देती परिणाम स्वरुप वायुमंडल के औसत ताप में निरंतर वृद्धि हो रही है, उसे विश्व उष्णन (Global warming) कहते हैं।
• CO2 के साथ-साथ मेथेन, नाइट्रस ऑक्साइड तथा जलवाष्प जैसी अन्य गैसे भी इस प्रभाव में योगदान देती है, इन्हें पौधा-घर गैसे कहते हैं।
वायु प्रदूषण रोकने के उपाय
• वाहनों में सीसारहित पेट्रोल या CNG गैस जैसे अन्य इन ईंधनों का प्रयोग करना चाहिए।
• वाहनों का उपयोग कम करना चाहिए व समय-समय पर दहन-इंजन का परीक्षण किया जाना चाहिए।
• वनों की कटाई पर रोक लगनी चाहिए एवं अधिक से अधिक वृक्षारोपण करना चाहिए।
• पर्यावरण स्वच्छता हेतु जनचेतना कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए। इसी के तहत जुलाई माह में वन महोत्सव मनाया जाता है।
• कल-कारखानों को शहर से दूर लगाया जाना चाहिए व कारखानों की चिमनियों पर गैस अवशोषक लगवाने चाहिए।
• कचरे को जलाने के स्थान पर कंपोस्ट पिट में डालना चाहिए।
• सौर ऊर्जा, जल ऊर्जा तथा पवन ऊर्जा को वैकल्पिक ईंधन के रूप में काम में लेना चाहिए।
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जल प्रदूषण
• जल जीवन के लिए एक बहुमूल्य संसाधन है। उत्तम स्वास्थ्य के लिए शुद्ध जल अनिवार्य है।
• जनसंख्या वृद्धि, उद्योग तथा कृषि में उपयोग के कारण शुद्ध जल दुर्लभ होता जा रहा है।
• मानवीय क्रियाकलापों द्वारा जल में कुछ ऐसे अवांछित पदार्थ मिल जाते हैं जो जल की गुणवत्ता को कम करके उसके रंग व गंध को बदल देते हैं, उसे जल प्रदूषण कहते हैं।
• वाहित मल, विषैले रसायन, उर्वरक, साबुन, डिटर्जेंट आदि पदार्थ जल को प्रदूषित करते हैं, इन पदार्थों को जल प्रदूषक कहते हैं।
जल कैसे प्रदर्शित हो जाता है?
• गंगा भारत की प्रसिद्ध नदियों में से एक है। यह अधिकांश उत्तरी, केंद्रीय तथा पूर्वी भारतीय जनसंख्या का पोषण करती हैं।
• कई वर्षों से गंगा नदी की प्रदूषण स्तर में वृद्धि हो रही है। गंगा नदी के आसपास रहने वाले लोग कूड़ा-कर्कट, अनुपचारित वाहित मल, मृत जीव तथा अन्य व हानिकारक पदार्थ सीधे ही इस नदी में फेंक देते हैं।
• इसके कई स्थानों पर प्रदूषण का स्तर इतना अधिक हो गया कि इसके जल में जलीय-जीव जीवित नहीं रह पाते व यह नदी निर्जीव हो गई है।
• प्रकृति के लिए विश्वव्यापी कोष (WWF) द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया है की गंगा नदी संसार की 10 सबसे प्रदूषित नदियों में से एक हैं।
• उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में गंगा नदी सर्वाधिक प्रदूषित है। यहां के लोग इस नदी में स्नान करते हैं, कपड़े धोते हैं तथा मल-मूत्र त्यागते हैं।
• वे इस नदी में कूड़ा-कर्कट, फूल, पूजा सामग्री तथा पॉलिथीन आदि फेंकते हैं।
• कानपुर में 5000 से अधिक औद्योगिक इकाइयां है। इसमें उर्वरक, अपमार्जक, चर्म तथा पेंट की फैक्ट्रियां सम्मिलित हैं, ये इकाइयां विषाक्त रासायनिक अपशिष्टों को नदी में छोड़ती है।
• वे उद्योग जल का रासायनिक संदूषित करते हैं। इन रसायनों में आर्सेनिक, लेड तथा फ्लुराइड होते हैं।
• 1985 में गंगा नदी को बचाने के लिए एक महत्वाकांक्षी परियोजना आरंभ की गई जिसे गंगा कार्य परियोजना कहते हैं।
• 2016 में भारत सरकार ने नए प्रस्ताव का शुभारंभ किया जिसे ‘नमामि गंगा’ या स्वच्छ गंगा भारत मिशन के नाम से जाना जाता है।
जल प्रदूषण के प्रभाव
• तेल परिष्करण शालाओं, कागज उद्योग फैक्ट्रियां वस्त्र तथा चीनी मिलों से निष्कासित रसायनों के प्रदूषित जल द्वारा कृषि भूमि में मिल जाने से पौधों तथा जंतुओं में आविषता उत्पन्न हो जाती हैं।
• खरपतवारनाशी व कीटनाशी जल में घुलकर खेतों से जलाशयों तक पहुंच जाते हैं। ये भूमि से रिसकर भौम-जल को प्रदूषित करते हैं।
• अशुद्ध जल से मृदा की अम्लीयता बढ़ती है जिससे लाभदायक सूक्ष्मजीवों की वृद्धि रुक जाती हैं।
• वाहित मल द्वारा संदूषित जल में जीवाणु, वायरस, कवक तथा परजीवी हो सकते हैं, जिसे मनुष्य शरीर में हैजा, टाइफाइड, पीलिया तथा चर्म रोग उत्पन्न होते हैं।
• उर्वरकों में उपस्थित नाइट्रेट एवं फास्फेट जैसे रसायन शैवालों को फलने-फूलने के लिए पोषक की भांति कार्य करते हैं जिससे जल में शैवालों की अत्यधिक वृद्धि हो जाती है तथा उनको शैवाल ब्लूम कहते हैं।
• जब यह शैवाल मर जाते हैं तो जीवाणु इनका भोजन के रूप में प्रयोग करते हैं। ये अत्यधिक ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं इससे जल में ऑक्सीजन के स्तर में कमी हो जाती हैं व जलीय जीव मर जाते हैं।
• विद्युत संयंत्रों तथा उद्योगों से आने वाला गर्म जल भी प्रदूषक का कार्य करता है। यह जलाशयों ताप में वृद्धि कर लेता है जिससे उसमें रहने वाले पेड़-पौधों व जीव-जंतुओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं।
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पेयजल क्या होता है?
पीने के लिए उपयुक्त जल को पेयजल कहते हैं।
• देखने में जो जल स्वच्छ प्रतीत होता है उसमें रोग-वाहक सूक्ष्मजीव तथा घुली हुई अशुद्धियां हो सकती हैं। अतः पीने से पहले जल को उबाल कर शुद्ध करनाआवश्यक है।
जल को कैसे शुद्ध किया जा सकता है?
• घरेलू उपयोग के लिए जल को घरेलू फिल्टर (कैंडल फिल्टर) द्वारा शुद्ध किया जा सकता है।
• उबालने से जल में उपस्थित जीवाणु मर जाते हैं अतः उबालकर भी जल को शुद्ध किया जाता है।
• रासायनिक विधि में जल में क्लोरीन की गोलियां अथवा विरंजक चूर्ण मिलाकर जल को शुद्ध किया जाता है।
• फिटकरी का प्रयोग भी जल की अशुद्धियों को दूर करने के लिए किया जाता है।
• जल उपचार संयंत्रों में विभिन्न भौतिक एवं रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा जलाशयों में गिरने से पूर्व जल को शुद्ध किया जाता है।
क्या किया जा सकता है?
• सभी औद्योगिक क्षेत्र में जल उपचार संयंत्र स्थापित किए जाने चाहिए।
• औद्योगिक इकाइयों के लिए बनाए नए नियमों को शख्ती से लागू किया जाना चाहिए।
• धुलाई तथा घरेलू कार्य में उपयोग किए गए जल का पुनः उपयोग जैसे सब्जियों को धोने के लिए तथा पौधों की सिंचाई में इस्तेमाल किया जा सकता है।
• ब्रश करते समय नल खुला नहीं छोड़ना चाहिए।
जल की बचत के लिए कम उपयोग, पूर्ण उपयोग, पुनः चक्रण, पुनः प्राप्त करना और उपयोग न करना हमारा मूल मंत्र होना चाहिए।
महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर
Q.1 वायु प्रदूषण किसे कहते हैं?
वायु में अवांछित पदार्थों के मिल जाने से वायु की प्रकृति एवं संगठन में बदलाव आ जाता है, जिसे वायु प्रदूषण कहते हैं।
Q.2 किन विभिन्न विधियों द्वारा जल का संदूषण होता है?
• घरेलू अपशिष्ट, वहित मल, साबुन, डिटर्जेंट आदि से जल प्रदूषित होता है।
• उद्योगों व कल-कारखानों से निकले विषैले रसायन जल प्रदूषित करते हैं।
• कीटनाशक व उर्वरक वर्षा जल के साथ बहकर खेतों से जल स्रोतों तक पहुंच जाते हैं जिससे जल प्रदूषित होता है।
Q.3 स्वच्छ, पारदर्शी जल सदैव पीने योग्य होता है टिप्पणी लिखिए
यह सच है कि हमें सदैव स्वच्छ तथा पारदर्शी जल ही पीना चाहिए। परंतु, यह सही नहीं है कि स्वच्छ पारदर्शी जल सदैव पीने योग्य होता है। क्योंकि, उसमें रोगवाहक सूक्ष्मजीव और घुले हुए अपद्रव्य भी हो सकते हैं, जिसको पीकर हम बीमार भी पढ़ सकते हैं। इसलिए सदैव शुद्ध पेयजल ही पीना चाहिए। अगर पानी की गुणवत्ता के बारे में सही जानकारी ना हो तो उसे उबालकर या फिल्टर करके ही पीना चाहिए।
Q.4 आप अपने शहर की नगर पालिका के सदस्य हैं। ऐसे उपायों की सूची बनाइए जिससे नगर के सभी निवासियों को स्वच्छ जल की आपूर्ति सुनिश्चित हो सके।
अगर मैं नगर पालिका का सदस्य होता तो मैं स्वच्छ जल की आपूर्ति के लिए जल बोर्ड के साथ समय-समय पर बैठक करता और जल के नमूने गैर-सरकारी प्रयोगशाला में भी भेज उसकी जांच करवाता। यदि आवश्यक होता तो इस संबंध में पत्र आदि के द्वारा दिल्ली तक बोर्ड को उचित कार्यवाही के लिए कहता। इसके साथ-साथ सभी पाइपों को भी समय-समय पर चेक करवाता ताकि कहीं से पेयजल का पाइप खराब हो तो बदला जा सके ताकि संदूषित जल घरों तक नहीं पहुंच सके और इसके अलावा क्षेत्र की पानी की टंकियों को भी समय-समय पर चेक करवाता और साफ सफाई का ध्यान रखता।
Q.5 शुद्ध वायु तथा प्रदूषित वायु में अंतर स्पष्ट कीजिए।
शुद्ध वायु- शुद्ध वायु हमारे स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसी वायु जिसमें कार्बन, ऑक्सीजन आदि गैसे सही मात्रा में उपलब्ध हो, शुद्ध वायु कहलाती हैं। यदि यह उपलब्ध नहीं हो तो हम स्वसन रोगों से ग्रसित हो जाएंगे और स्वस्थ जीवन नहीं जी सकेंगे।
प्रदूषित वायु- यह हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। दुनिया भर में औद्योगीकरण के बढ़ते कदमों से इसकी मात्रा में लगातार वृद्धि हो रही है। विश्व उष्णन तथा अम्ल वर्षा आदि इसी के प्रमाण है। इसे रोकने के लिए अधिक से अधिक पेड़ लगाने चाहिए। प्रदूषण रहित ईंधन और सौर ऊर्जा आदि का प्रयोग करना चाहिए।
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